भारतीय रेलवे की अनोखी पहल: सचखंड एक्सप्रेस में 29 वर्षों से यात्रियों को मिल रहा मुफ्त भोजन
भारतीय रेलवे लगातार यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने की दिशा में काम कर रहा है। इसी कारण भारतीय रेल को दुनिया की प्रमुख रेल सेवाओं में गिना जाता है। यात्रियों को यात्रा के दौरान न केवल सफर की सुविधा मिलती है, बल्कि खाने-पीने की सुविधाएं भी पहले से कहीं बेहतर हुई हैं। आज यात्री ट्रेन में अपनी सीट पर ही खाना मंगवा सकते हैं। IRCTC की वेबसाइट या मोबाइल ऐप के माध्यम से मनपसंद भोजन ऑर्डर किया जा सकता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ट्रेन ऐसी भी है जिसमें पिछले 29 वर्षों से यात्रियों को मुफ्त और भरपेट भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है? यह ट्रेन है अमृतसर-नांदेड़ सचखंड एक्सप्रेस, जिसमें लंगर के माध्यम से यात्रियों को नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात्रि का भोजन मुफ्त में दिया जाता है।
खाने की चिंता नहीं, 2081 किलोमीटर का सफरसचखंड एक्सप्रेस 2081 किलोमीटर का सफर तय करती है और इसमें लगभग 33 घंटे का समय लगता है। ट्रेन में पैंट्री कार भी है, लेकिन उसमें खाना नहीं पकाया जाता, क्योंकि यात्रियों को स्टेशनों पर लंगर के माध्यम से भोजन मिल जाता है। यात्रियों को अपने साथ खाना लाने की आवश्यकता नहीं होती।
39 स्टेशनों पर रुकती है, 6 पर लंगर की व्यवस्थायह ट्रेन 39 स्टेशनों पर रुकती है, जिनमें से 6 स्टेशनों पर यात्रियों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई है। स्टॉपेज की योजना ऐसे बनाई गई है कि यात्री आराम से भोजन ग्रहण कर सकें। नई दिल्ली और डबरा स्टेशन पर दोनों दिशाओं में लंगर की सुविधा उपलब्ध रहती है। यात्रियों को इस सेवा की जानकारी होती है, इसलिए वे अपने साथ बर्तन लेकर चलते हैं।
रोजाना 2000 यात्रियों के लिए भोजनइस ट्रेन में जनरल से लेकर एसी कोच तक, सभी वर्ग के यात्री लंगर सेवा का लाभ उठाते हैं। हर दिन लगभग 2000 लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। भोजन में प्रतिदिन अलग-अलग व्यंजन परोसे जाते हैं जैसे कढ़ी-चावल, छोले, दाल, खिचड़ी, आलू-गोभी आदि। इस सेवा का खर्च गुरुद्वारों में आने वाले दान से पूरा किया जाता है। सेवा इतनी नियमित है कि 29 वर्षों में एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब लंगर न परोसा गया हो, चाहे ट्रेन कितनी भी देर से क्यों न पहुंचे।
ट्रेन का इतिहाससचखंड एक्सप्रेस अमृतसर और नांदेड़ के बीच चलती है। यह ट्रेन 1995 में सप्ताह में एक बार शुरू की गई थी। बाद में 1997-98 में इसे सप्ताह में दो बार और फिर पांच बार चलाया जाने लगा। 2007 से यह ट्रेन सप्ताह में सातों दिन चल रही है। लंगर सेवा की शुरुआत सिख व्यापारियों ने की थी जिसे बाद में स्थानीय गुरुद्वारों ने नियमित रूप से जारी रखा।
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